lost soul 2

Thursday, 13 November 2014

शायद हाँ, शायद नहीं !!!!!


आज फिर से दिल में एक तूफ़ान सा उठ खड़ा हुआ है और उस तूफान ने मुझे मजबूर कर दिया की मैं अपने जज्बातों को कोरे कागज पे उतार दूँ।

शायद मेरे दिल की आग कुछ शांत हो जाए। 

कोई नही, कोई भी नही जिससे मैं अपने हाले-दिल बयां कर सकूँ, या फिर  शायद मुझमे हिम्मत नही की कह सकूँ की मैं टूटा हुआ हूँ, वक़्त और हालत के थपेड़ों से हारा  हुआ, महज एक अदना सा इंसान, जिसकी कुछ उम्मीदे, कुछ  सपने टूटकर  चूर-चूर हो गये  पर किसी को तो बताना ही होगा, अपने दिल के जख्मों को ज़माने की खुली हवा लगाना ही होगा, और देखिये मैंने एक नया पोस्ट कर डाला अपने ब्लॉग पे, क्योंकि यहाँ कोई नहीं जानता मुझे, कोई नहीं पहचानता मुझे, कोई फिर मुझे देख कर एक रहस्य भरी मुस्कान नहीं छोड़ेगा, कोई मुझे देखकर सहानुभूति भरे दो शब्द नहीं कहेगा । 

क्योंकि यहाँ पे मैंने शुरुआत ही की है अपनी हकीकत बता कर, चाहे जैसा भी हूँ  मैं, पागल, असफल और वो सब कुछ जो मैं बन चूका हूँ। 

आज बाजार में एक खुबसूरत लड़की को देखा, एक पल के लिए ऐसा लगा की वो ही है, बिल्कुल उसी के जैसे आँखे, उसके जैसे होंठ, उसकी जैसी मुस्कुराहट,उसके जैसे ही बात करने का अंदाज।

मैं भाग कर गया, रोड के उस पार जहाँ वो कुछ खरीदने गयी थी, मैं पास गया, बिलकुल पास उसी दुकान में, और उसके पीछे मुड़ने का इंतज़ार करने लगा। दिल में एक आस थी, एक अजब सी ख़ुशी, ये जानते हुए की ये सपना सच नही हो सकता , वो इस वक़्त यहाँ सपने में भी नहीं आ सकती। 

पर आखिर इस नादाँ दिल को कौन समझाए जो हर बात में अपनी जिद पर अडिग  रहता है। बहुत दिनों के बाद मैं बिल्कुल वैसे ही उसी अंदाज में था, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि  दुकानदार क्या सोचेगा, और मैं खड़ा रहा वहीँ चुपचाप, दुकानदार भी व्यस्त  था अपने काम में, और वो भी, और मैं कुछ बोलने में असमर्थ, बस वहीँ खड़ा रहा।

दिल में बस एक इच्छा जो कहीं दब गयी थी, या मैंने उसे बड़ी बेरहमी से कुचल डाला था, फिर से सर उठा रही थी, उसको देखने की ललक, उससे बात करने की इच्छा, उसको अपने करीब महसूस करने की इच्छा, और मैं खड़ा  रहा। 

उसने देखा मुड़कर, और ये वो नही थी, उसने मुझे देखकर शायद एक बार प्रश्न भरी निगाहों से देखा भी, पर मैं वहीँ खड़ा रहा, कुछ भी बोलने में असमर्थ, और वो चली गयी एक छोटी  सी  मुस्कान छोड़ते हुए। पता नही क्यों  मुझे खुश होना चाहिए या उदास मैं नही जानता। 

जिंदगी शायद कहती भी है, इशारे भी करती है नयी शुरुआत करने को, पर उसकी याद ज़ेहन से जाती ही नहीं, तो किसी और के लिए जगह कहाँ से बनाऊ।
 
और मैं वापस चला आया, वापस अपनी दुनिया में जिसे मैंने बिल्कुल  अलग बना रखा है, ताकि कोई न देख सके, और बहुत चाह  की निकाल दूं उसका ख्याल अपने दिलो-दिमाग से, बहुत कोशिश की न याद आये वो मुझे इस बुरी तरह से, जो जब भी आती है मुझे पागल-आशिक-दीवाना बना देती है और मुझे खुद पे ज़ोर नहीं रहता ।

पर शायद जितना मैं उसे भूलने की कोशिश करता हूँ, उतना ही उसका ख्याल मेरे दिलो-दिमाग में काबीज हो जाता है, उसका वो प्यारा सा चेहरा मेरी निगाहों के सामने नाचने लगता है, उसकी  मधुर आवाज इन कानों  में गूंजने लगती है, और मैं पूरी रात बस कशमकश में निकल देता हूँ।

पता नही वो भी मुझे कभी भूल से याद करती होगी या नहीं, शायद नहीं।

एक अरसा बीत गया, पर अभी भी शायद मैं उसी मोड़ पे खड़ा हूँ , उसी चौरस्ते पे, जहाँ से मुझे पता नहीं की जाना किधर है, और मैं कोई एक रास्ता पकड़ के भाग पड़ता हु, दूर बहुत दूर, बिल्कुल  तेज, ताकि इस चौरस्ते से बहुत दूर जा सकूँ, पर काफी दूर निकलने के बाद फिर से वो रास्ता मुझे उसी चौरस्ते पे ला खड़ा छोड़ देता है.

जिंदगी भी बहुत अजीब है, अक्सर वो लम्हे जो खुशनुमा होते हैं, याद नहीं आते और वो पल जो हमें रुला गए हो, उनकी जरा भी याद आ जाए तो पुराने जख्म फिर से हरे हो जाते हैं।

कोई आशा नहीं की वो मेरी जिंदगी में वापस आएगी कभी, पर फिर आज उसको एक नजर देखने की इच्छा क्यों आती है आखिर?

कोई उम्मीद नहीं की वो मेरे प्यार को कभी समझ पाएगी, पर उसकी आवाज सुनने को क्यों तरसता है ये दिल ?

कोई उम्मीद नहीं की वो कभी मेरा नाम अपने लबों पर लाएगी, पर  उसकी एक आवाज सुनने को क्यों तरसता है मन फिर?

कोई उम्मीद नहीं की वो फिर इन तरसते बाहों में आकर सुलगते जिस्म पे रूहानी ठंडक दे जाएगी, पर उसका इंतज़ार करने को क्यों  मचलता है ये दिल?

शायद ये प्यार था, जो कभी परवान चढ़ा था  !!!!!

शायद ये प्यार है, अभी भी जिन्दा, दिल के किसी कोने में कैद, जो जब भी मौका मिलता है आजाद होने को छटपटाने  लगता है।

शायद मेरी जिंदगी यूँ ही इस "शायद" लफ्ज में उलझी रह जाएगी, शायद हाँ, शायद नहीं  !!!!!
  

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